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Monday, June 30, 2008

antarnaad

बचपन को नज़र भर देख ताक पर रखा
वो शरारतों से भरा निश्छल बचपन
हर वक्त महकता कोलाहल भरपूर
ममता की छॉव में पलता
जिन्दगी नन्हें दिमाग से तौलता

उसने यौवन की दहलीज़ पर कदम रखा
आँखों में मदमाते स्वप्न
पलकों में ममता का नूर
इठलाती, बलखाती जवानी
कई नजरें थी उसकी दिवानी

वक्त के दिए साथ का उसने मान रखा
वो साथी से शर्मिला मिलन
हर पल बन गया था कोहिनूर
नैनों ने नैनों से की अनगिनत बातें
कटे ऐसे ना जाने कितनी दिन कितनी रातें

गम ने चोरी से पिछवाड़े से कदम रखा
सूनी धरती सूना हो गया गगन
रोते-रोते हो गई आँखों बेनूर
साथी का साथ छूट गया
आँचल खाली ही रह गया

जिन्दगी ने क्यों ममता से वंचित रखा
थी कितनी वो खुशियों में मगन
और अब लबों से हँसी हो गई दूर
काश उसने कहा होता हाँ
आज उसे कोई कहता माँ

1 comment:

Thanks for giving your valuable time and constructive comments. I will be happy if you disclose who you are, Anonymous doesn't hold water.

आपने अपना बहुमूल्य समय दिया एवं रचनात्मक टिप्पणी दी, इसके लिए हृदय से आभार.