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Friday, October 12, 2012

तुम्हे बुलाती हैं- tumhe bulati hain




उन  अश्रु  बूंदों  में  उसकी  मोहक   छवि  झिलमिलाती  है 
वो  क्या  जाने  बिखरे  गेसू  उन  उँगलियों  को  बुलाती  हैं
सवेरे  की  पहली  किरण  मुस्कान  बनकर   जगाती   है
पुष्पों  का  झूमना  उनकी  आहटें  मेरे  दिल  को  सुनाती  हैं

वो  मेघों  का  भ्रमण  चपलता  के  किस्से  लगाता  है
पंछियों  की  चहचहाहट  ठिठोली  की  गूँज  सुनाती  हैं
मंद  पवन  का  बहना  स्पर्शों  की  अनुभूति  कराता  है
साँझ  की  बेला  शब्दों  के  मुखरित  पुष्प  रह-रह  बरसाते  हैं

नन्हे  बालकों  सा  तुम्हारा  भोलापन  अब  भी  मुझे  लुभाता  है
सुनो  ये  यादों  की  नदिया  की  लहरें  उछल-उछल  तुम्हे  बुलाती  हैं

7.20 pm, 12/10/2012

6 comments:

  1. आपने मनोभावों को बड़ी सरलता से उकेरा है...इन शब्दों के सहारे..|
    बहुत खूब...
    सादर |

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  2. बहुत सुन्दर भाव ...

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  3. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति.

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  4. उन अश्रु बूंदों में उसकी मोहक छवि झिलमिलाती है
    वो क्या जाने बिखरे गेसू उन उँगलियों को बुलाती हैं

    us avykt ke prati aapke udgaar hai ye
    vah koi purush nahi
    vah vah hai jo sampurnta ka pratik hai
    नन्हे बालकों सा तुम्हारा भोलापन अब भी मुझे लुभाता है
    सुनो ये यादों की नदिया की लहरें उछल-उछल तुम्हे बुलाती हैं

    prakriti ke prtyek halchal me tumhe usi ka ahsaas hota hai

    bahut achchhi kavita badhaaii priti ji

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