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Sunday, September 2, 2012

बंदगी





हमने  बंदगी  देखी  नन्ही  कलियों  में
इबादत  को  पाया  है  नन्ही  आँखों  में
दुआ  है  या  रब! तू  आज  भी  बसता  है  बन्दों  में

12.39pm, 31/8/2012


ख़ामोशी  की  भी जुबान होती है, प्रीत की भी अपनी पहचान होती है
गुनाह नही, इबादत है, उसकी रहमत की तरह इश्क से लोग अंजान हैं
7.34pm, 1/9/2012

4 comments:

  1. भगवान तो अपने बन्दों में ही रहता है ...
    सच कहा है ... क्या बात है ...

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  2. खुदा का नाम लेने में तो हमसे देर हो जाती.
    खुदा के नाम से पहले हम उनका नाम लेते हैं..

    पाया है सदा उनको खुदा के रूप में दिल में
    उनकी बंदगी कर के खुदा को पूज लेते हैं..
    बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको
    और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

    http://madan-saxena.blogspot.in/
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    http://madanmohansaxena.blogspot.in/

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  3. उसकी रहमत की तरह इश्क से लोग अंजान हैं

    ha sahi kahaa aapne ...

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आपने अपना बहुमूल्य समय दिया एवं रचनात्मक टिप्पणी दी, इसके लिए हृदय से आभार.