जिस कमी ने अतीत में दूरी कर दी
उसी के आधिक्य से फिर दूरी कर दोगे?
वो सपना जो बिखर गया, कैसी बेबसी थी
आज मुद्रा के दंभ में वही कहानी दोहरा दोगे?
वो पत्र जिन्हें एकाकी होने पर तब नष्ट किये
वैसे ही अब के लेख अंधियारे में बैठ मिटाओगे?
पुराने घावों की टीसों ने कितने दिवस काले किये
ये दर्द देकर जो पाओगे जीवन फिर वैसे बिताओगे ?
उन हाथों की हिना में रच गया कोई दूजा नाम
अब भी हथेलियों की लाली में दूसरा नाम सजने दोगे?
गए उस वक़्त ने, ठोकरों से घबरा, लिया मुड़ने का नाम
ये घड़ी जो बीती, बहते नीर भांति, सदा के लिए गवां दोगे?
2.19pm, 16/4/2012

