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हृदय के उदगारों को शब्द रूप प्रदान करना शायद हृदय की ही आवश्यकता है.

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Monday, February 27, 2012

जिंदगी मिलती है?

छोडूँ  मैं  या  छोडो  तुम, दोनों  ही  हाथ  छूटते  हैं
जाऊँ   मैं  या  जाओ  तुम, दोनों   के  ख्वाब  टूटते  हैं

आगे  बढूँ  मैं, बढ़ो  आगे  तुम, दोनों  ही  कदम  जुड़ते  हैं
हाथ  बढाऊँ  मैं  और  बढाओ  तुम, तब  ही  हाथ  जुड़ते  हैं

कुछ  बोलूं  मैं, कुछ  बोलो  तुम, चुप्पी  तभी  टूटती  है
कुछ  सुलझुं  मैं,  कुछ  सुलझो  तुम, उलझन  तभी  छूटती  है

जो  रूठूं  मैं  और  रूठ  जाओ  तुम, किस्मत  तभी  रूठती  है
जुदा  रहूँ  मैं  और  जुदा  रहो  जो  तुम, दुनिया  तभी  लूटती  है

मुस्कुराऊँ  मैं, मुस्कुराओ  तुम,  मोहब्बत  फिर  खिलती  है
तुम्हारी  बनूँ  मैं और  मेरे  बनो  तुम, जिंदगी  फिर  मिलती  है

3.43pm 26/2/2012



10 comments:

  1. वाह! प्रीति जी वाह!
    सुन्दर अनुपम प्रस्तुति है आपकी.
    सरल मृदुल शब्द और भावों का संयोजन
    दिल को छूता है.

    शानदार प्रस्तुति के लिए आभार जी.

    मेरे ब्लॉग पर आईएगा.
    'मेरी बात...' पर कुछ अपनी कहिएगा.

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  2. पारस्परिक यह लेना देना,
    परम्परा है प्यार की ।

    प्रीत्यर्थी ये छुआ-छुआना,
    मर्यादित अभिसार की ।।


    दिनेश की टिप्पणी - आपका लिंक

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  3. YOU HAVE EXPRESSED THE BEAUTY OF LOVE...AND IT IS THE SUBJECT OF UNDERSTANDING. THANX

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  4. बहुत ही सुन्दर गज़ल . शब्द का भाव बेहतर है .
    बधाई

    विजय

    www.poemsofvijay.blogspot.in पर आयियेंगा .

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  5. आपका धन्यवाद मेरे ब्लॉग पर आने के लिये

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  6. बहुत सुन्दर भाव स्नेह जी..

    सच है ताली दोनों हाथों से बजती है........

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  7. मुस्कुराऊँ मैं, मुस्कुराओ तुम, मोहब्बत फिर खिलती है
    तुम्हारी बनूँ मैं और मेरे बनो तुम, जिंदगी फिर मिलती है

    HAA SAHI KAHAA AAPNE BAHUT SUNDAR ..

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Thanks for giving your valuable time and constructive comments. I will be happy if you disclose who you are, Anonymous doesn't hold water.

आपने अपना बहुमूल्य समय दिया एवं रचनात्मक टिप्पणी दी, इसके लिए हृदय से आभार.