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हृदय के उदगारों को शब्द रूप प्रदान करना शायद हृदय की ही आवश्यकता है.

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Sunday, March 30, 2014

tum.... तुम






ऐसा ना हो कि ये बारिश अब थमे ना
उस दलदल में मेरा वजूद खो जाये ना
7.10pm
आँखों से बरसात छुपा तो लेंगे हम
पर दिल की जमीं अब सूखती ही नहीं
7.15pm
तेरी याद आती है तो सिहर उठते हैं हम
ना रो पाते हैं और ना मुस्कुरा पाते है हम
7.22 pm
इन आँखों से जो तुम बस गए दिल में

अब रौशनी कोई इन नजरों को भाती नहीं
7.34 pm
तुम परसों थे, कल थे, अब दिल में हमेशा रहोगे
नफरत खुद से होगी लेकिन तुमसे बस प्यार करेंगे

7.36 pm, 8 feb 14

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रीती जी...मन खुश हो गया पढ़ कर.

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Thanks for giving your valuable time and constructive comments. I will be happy if you disclose who you are, Anonymous doesn't hold water.

आपने अपना बहुमूल्य समय दिया एवं रचनात्मक टिप्पणी दी, इसके लिए हृदय से आभार.