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Thursday, February 6, 2014

mai hans rahi hun मैं हंस रही हूँ




तुम्हारी  चाहत  है  मैं  हँसूँ
देखो  ना  अब  मैं  हंस  रही  हूँ
पर  जानते  हो  ना  कुछ  कमी  है
मुस्काती  नैनों  की  चमक  वो  नही  है
फूल  कैसे  झूमे  बिन  अपने  प्रेम  भ्रमर  के
श्रृंगार  का  क्या  मोल  बिन  तेरे  सामीप्य  के
बस  अब  ना  रहना  तुम  मुझसे  यूँ  दूर  दूर  खड़े
आओ  अब  कि  मेरे  मन आँगन  में  रस  फुहार  पड़े
2.40pm, 6 feb 14

9 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (07.02.2014) को " सर्दी गयी वसंत आया (चर्चा -1515)" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है,धन्यबाद।

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  2. बहुत ही गहरे और सुन्दर भावो को रचना में सजाया है आपने.....

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  3. सुंदर प्रेम कविता।

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  4. बेहतरीन अभिवयक्ति.....

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  5. फूल कैसे झूमे बिन अपने प्रेम भ्रमर के
    श्रृंगार का क्या मोल बिन तेरे सामीप्य के...

    मनोभावों की बेहतरीन अभिव्यक्ति ;-))
    आज तो हम आपके ब्लॉग के सदस्य भी बन गए...अब पोस्टों से सम्पर्क बना रहेगा !
    शुभकामनाएँ:-))

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आपने अपना बहुमूल्य समय दिया एवं रचनात्मक टिप्पणी दी, इसके लिए हृदय से आभार.