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Sunday, April 22, 2012

आँखें वीरान


मेरी आँखों में क्या देखते हो, दूर तक सन्नाटा है
यहाँ तूफानों की आवाज भी कबसे खामोश हो गयी है
12.39pm,20/4/2012

मेरी नजरों को गौर से  न देख हैरानी होगी
नजरों की भीतर से झांकती वीरानी ही होगी
हम  मुस्कुराते  तो  हैं, पर  मेरे  होठों  को  ही  देखना 
बोलती  आँखें  तुम्हारी  मुस्कान  में  नमी  न  दे  जाये 

2 comments:

  1. बहुत बढिया।

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  2. इस सार्थक प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकार करें /

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आपने अपना बहुमूल्य समय दिया एवं रचनात्मक टिप्पणी दी, इसके लिए हृदय से आभार.