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हृदय के उदगारों को शब्द रूप प्रदान करना शायद हृदय की ही आवश्यकता है.

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Monday, October 11, 2010

मौन समर्पण


पगली  को  
वक़्त  ने  नहीं  
योगी  ने  
दूर  
किया  
वक़्त  ने  
तो  
जतन  
कर  
मिलाया  था  
वो
विदाई  का  सन्देश  
जो  सुनवाया  था,
योगी  को  
करीब
लाया  था  
स्वयं  
नजदीकी  का  प्रयास  
और  
एक  दिन  
बना  दिया  
इस  पगली  को  
चंद्रिके
इतना  
करीब  
स्वयं  को  लाये  
स्वयं  योगी  
स्वयं  ही  घबरा  गए  
स्वयं  ही  छिटक  गए  
वो  
रात  
जो  
थी  
मिलन  की  
नवजीवन  की ...
क्यूँ  
घबरा  गए  
जिस  रात  ने  
योगी  
निंद्रा  दी,
चंद्रिके
दी ..
बदली  की
ओट  से  
योगी  
चंद्रिके
को  
स्वयं  निकला  था .
पूछने  पर  भी  
कुछ  भी    
माँगा  था  
पगली  ने  
फिर  क्या  
भूल  हुई  
जिसकी  
सजा  
पाई  पगली  ने ….
क्यूँ  
मौन  समर्पण  
अपराध  
बना  
क्यों  जीवन  में  
अवसाद  
भरा  
नहीं  
जान  
पाई  
ये  पगली  
क्यूँ  
सजा  मिली  
समर्पण  पर  
और  
फिर  
पगली  ने  
सजा  के  लिए  
भी  
किया  
मौन  समर्पण ….
बस  
मौन  समर्पण
9.33 p.m., 15/5/10

2 comments:

  1. कल 20/12/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  2. bahut sundar dhang se piroya hai ahsaason ko

    ReplyDelete

Thanks for giving your valuable time and constructive comments. I will be happy if you disclose who you are, Anonymous doesn't hold water.

आपने अपना बहुमूल्य समय दिया एवं रचनात्मक टिप्पणी दी, इसके लिए हृदय से आभार.