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Tuesday, July 7, 2015

kyun pyar क्यों प्यार



वो कहते मुझसे क्यों इतना प्रेम है
सब कहते क्यों उससे इतना प्यार है
व्यथित पूछूँ प्रेमदेव से क्यों इतनी प्रीत है

क्या कहूँ मैं तो नहीं जानूं इसका उत्तर
पूछूँ तुमसे इस जगसे मुझे दे दो प्रत्युत्तर
क्यों नेह कर हुई नजरों में तुम्हारी कमतर

क्यों हृदय को है इतनी उनकी लगन
वो तो हैं जीवन की रंगीनियों में मगन
क्यों भर गयी स्नेह भरे जीवन में अगन

चित्कार करता मन क्यों इतनी वेदना है
असहनीय अब पीड़ा में इस तरह जीना है
छलकती प्रणय पीर नीर से भरी नेत्र गागर है

व्यथित हो पूछूँ तुमने फैलाया वो मायाजाल
किस कदर उलझ गयी मैं हो गयी देखो बेहाल
तुम ही कहो ना क्यों तुम्हारी 'प्रीति' में मेरा ये हाल
@prritiy, 10.47 pm, 5 july 2015

1 comment:

Thanks for giving your valuable time and constructive comments. I will be happy if you disclose who you are, Anonymous doesn't hold water.

आपने अपना बहुमूल्य समय दिया एवं रचनात्मक टिप्पणी दी, इसके लिए हृदय से आभार.