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Wednesday, November 26, 2014

bas maanvi banne do बस मानवी बनने दो

कहते  हैं   सम्मान  करते  हैं
बहुत  ऊँचा  एक  स्थान  दिया  है

पुरुष  देता  है  यूँ  देवी  नाम
या  समझते  खेलने  की  वस्तु  तमाम

कहे  वो  जिसे  कहते  हो  देवी
मानवी  हूँ  मैं  लिए  भाव  सभी

नहीं  चाह  सारी  दुनिया  जीतने  की
हृदय  आकांक्षी  स्नेह  मिले  हों  जिनकी

देवी  भी  भावों  से  होती  है  भरी
मुस्काये  मन  की  बगिया  हो  जब  खिली

मुझे  बस  मानव  बनने  का  ही  दो  सम्मान
न  देवी  कहो  न  गिराओ  लगा  तुच्छ  इल्जाम

11.18pm, 19 nov, 14

4 comments:

  1. सच है देवी बन के मंदिर में कौन रहन चाहता है ... इंसान ही मान के देख ले ... व्यवहार में बराबरी का सामान देना ही बहुत है ...

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (28.11.2014) को "लड़ रहे यारो" (चर्चा अंक-1811)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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  3. मुझे बस मानव बनने का ही दो सम्मान
    न देवी कहो न गिराओ लगा तुच्छ इल्जाम
    ...बहुत सटीक और भावपूर्ण अभिव्यक्ति...

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  4. नहीं चाह सारी दुनिया जीतने की
    हृदय आकांक्षी स्नेह मिले हों जिनकी
    उत्तम

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आपने अपना बहुमूल्य समय दिया एवं रचनात्मक टिप्पणी दी, इसके लिए हृदय से आभार.