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Wednesday, July 25, 2012

अबकी



मैंने  दिवास्वप्न  में  प्रीति  के  दिए  जलाये  हैं 
अबकी  बहार  को  मेरा  आँगन  सजाना  ही   है 


मनभावन  रंगों  से स्वप्न  रंगोली  बनानी  है 
कि  मुस्काए,  आहा   रंगों  से  भरा  जीवन  है 

राहों  को  सुगन्धित पुष्पों   से  सजाया   है 
आए  वो  बहार  तो  कहे  यहीं  का  हो  रहना  है 

तारों  से  सजा, उजली  उनकी  राह  करनी  है 
वो  कहें  मिट  गया  मन  का  सारा  अँधियारा  है (11.52pm, 15/7/2012)

पत्रों  की  हरीतिमा  को  जतन  से  लगाया  है 
कि  मन  सदा  कहे  जीवन  में  बसी  हरियाली  है 

स्व  को  किया उनकी  चरणों  का  आधार  है 
कि  वो  सोचें 'प्रीति' बिना  कैसे  कदम  बढ़ाना  है 
2.44pm, 19/7/2012



11 comments:

  1. बहुत बढ़िया..
    सब कुछ इतना प्यारा होगा तो
    आपके बिना कदम बढ़ाना तो सोचेंगे भी नहीं..
    :-)

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  2. बहुत सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति शुभकामनाएं

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  3. राहों को सुगन्धित पुष्पों से सजाया है
    आए वो बहार तो कहे यहीं का हो रहना है ..

    काश की बहार के बहाने वो भी आयें ए यहीं के हो के रह जाएँ ... कल्पना में छिपी कल्पना भी तो हो सकती है ...

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    1. ji 'vo' bahar 'unke' liye hi kaha hai.
      abhaar

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  4. Great lines. Thanks for sharing :)

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  5. स्व को किया उनकी चरणों का आधार है
    कि वो सोचें 'प्रीति' बिना कैसे कदम बढ़ाना है

    bahut badhiyaan ..

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  6. स्व को किया उनकी चरणों का आधार है
    कि वो सोचें 'प्रीति' बिना कैसे कदम बढ़ाना है

    बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति.
    स्वतंत्रता दिवस की बधाई और शुभकामनाएँ.

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  7. बहुत शानदार ग़ज़ल, शानदार भावसंयोजन हर शेर बढ़िया है आपको बहुत बधाई

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