बरसों, बीते, तुम जो गए
सदियाँ जी ली
जोगन हो ली
नयन झुके, कजरा बहा
केश खुले, गजरा ढला
कानों में चुभती, चूड़ी की खनक
पैरों को डसती, पायल की ललक
क्या सोलह श्रृंगार
क्या तन का विचार
क्या सुनूँ मै आहट
अब कैसी मुस्कराहट
नित्य वो आई, लिए, तारों की चुनर
वो आये, लिए, तम भेदने का हुनर
फूल मुस्काए, कुम्हलाये
दीप, बुझने को टिमटिमाये
कई सावन बरसे, आँगन रहा सूखा-सा
कोंपल तो फूटे, पर, बसंत रहा रुखा-सा
हेमंत ने ठिठुरन भरी, ग्रीष्म ने फैलाई बाहें
मेरे दर तक पहुंची, बस, पतझड़ की राहें
पलकों में स्वप्न आये, रैन बीत गए
तुमसे जो बिछुड़े, होठों से गीत गए
कितनी बार धान रोंपी, फसलें कटी
पल के सहेस्रों टुकड़ों में , मै बँटी
जोगन हो ली
सदियाँ जी ली
अभी दो पल ही तो बीते तुम्हे गए
9:43 pm, 12 dec,09
सदियाँ जी ली
जोगन हो ली
नयन झुके, कजरा बहा
केश खुले, गजरा ढला
कानों में चुभती, चूड़ी की खनक
पैरों को डसती, पायल की ललक
क्या सोलह श्रृंगार
क्या तन का विचार
क्या सुनूँ मै आहट
अब कैसी मुस्कराहट
नित्य वो आई, लिए, तारों की चुनर
वो आये, लिए, तम भेदने का हुनर
फूल मुस्काए, कुम्हलाये
दीप, बुझने को टिमटिमाये
कई सावन बरसे, आँगन रहा सूखा-सा
कोंपल तो फूटे, पर, बसंत रहा रुखा-सा
हेमंत ने ठिठुरन भरी, ग्रीष्म ने फैलाई बाहें
मेरे दर तक पहुंची, बस, पतझड़ की राहें
पलकों में स्वप्न आये, रैन बीत गए
तुमसे जो बिछुड़े, होठों से गीत गए
कितनी बार धान रोंपी, फसलें कटी
पल के सहेस्रों टुकड़ों में , मै बँटी
जोगन हो ली
सदियाँ जी ली
अभी दो पल ही तो बीते तुम्हे गए
9:43 pm, 12 dec,09

