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बहे स्नेह्धारा अविरल
संवारूं जग को प्रतिपल
करती रहूँ सबकी भलाई
किसने है सीख सिखाई
वो मेरी माँ है
हर चीज को मिल बाँटना
चाहों को शीशा दिखाना
परिवार पहले है आता
कहाँ से ये गुण समाता
वो मेरी माँ है
भूखे पेट कभी सो लेना
तृप्ति हर दिल में भर देना
गुड़ बर्फी से मीठी पाई
किसने त्याग की रीत बताई
वो मेरी माँ है
छोटों को दुलार करना
बूढों का मनुहार करना
सबका मान है स्वमान से बड़ा
किसने दिखाई सम्मान की विधा
वो मेरी माँ है
सबकी प्रिय हूँ मानी जाती
आदर सबसे निरंतर पाती
मुस्काते , बाधाओं से लड़ना
कहाँ से आई ये प्रेरणा
वो मेरी माँ है
माँ सम कर्मठ हैं कहते मुझको
माँ सी सायानी है कहते मुझको
हूँ आज जो सबकी दुलारी
किससे पाई ये छवि प्यारी
वो मेरी माँ है!
12:45 p.m., 10/8/10


