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कोई तन से होते हैं
तुम मन से हो अधूरे
चाहा सभी की चाहत पाना
हुए स्वयं नहीं किसी के पूरे
चले लिए छल की बैसाखी
न बने किसी का कभी सहारा
कैसे समझ पाते फिर मुझको
सच्चे नेह को ना कभी सराहा
झूठी चाहत के अश्व पर
की तुमने सदा ही सवारी
भला तुम्हे फिर कैसे लगती
प्रीत भरी आँचल छाँव प्यारी
तुम्हारी चाहत में डूबी पर
अनामिका सी रही जग में
रहे तुम गीतों में समाये
नदी तीर सी रही विलग मैं
नहीं है वो बात तुझमें
बाँध रख पाती जो अपनेपन में
तुम मन से हो अधूरे
चाहा सभी की चाहत पाना
हुए स्वयं नहीं किसी के पूरे
चले लिए छल की बैसाखी
न बने किसी का कभी सहारा
कैसे समझ पाते फिर मुझको
सच्चे नेह को ना कभी सराहा
झूठी चाहत के अश्व पर
की तुमने सदा ही सवारी
भला तुम्हे फिर कैसे लगती
प्रीत भरी आँचल छाँव प्यारी
तुम्हारी चाहत में डूबी पर
अनामिका सी रही जग में
रहे तुम गीतों में समाये
नदी तीर सी रही विलग मैं
नहीं है वो बात तुझमें
बाँध रख पाती जो अपनेपन में
इस रिश्ते को सदा अधूरा
रखा मन के तेरे अधूरेपन ने
6:54p.m., 15/8/10

