ब्लॉग में आपका स्वागत है

हृदय के उदगारों को शब्द रूप प्रदान करना शायद हृदय की ही आवश्यकता है.

आप मेरी शक्ति स्रोत, प्रेरणा हैं .... You are my strength, inspiration :)

Wednesday, September 14, 2011

अधूरापन- 3 [तुम्हारे मन का अधूरापन]

########################



कोई तन से होते हैं
तुम मन से हो अधूरे
चाहा सभी की चाहत पाना
हुए स्वयं नहीं किसी के पूरे

चले लिए छल की बैसाखी
न बने किसी का कभी सहारा
कैसे समझ पाते फिर मुझको
सच्चे नेह को ना कभी सराहा

झूठी चाहत के अश्व पर
की तुमने सदा ही सवारी
भला तुम्हे फिर कैसे लगती
प्रीत भरी आँचल छाँव प्यारी

तुम्हारी चाहत में डूबी पर
अनामिका सी रही जग में
रहे तुम गीतों में समाये
नदी तीर सी रही विलग मैं

नहीं है वो बात तुझमें
बाँध रख पाती जो अपनेपन में
इस रिश्ते को सदा अधूरा
रखा मन के तेरे अधूरेपन ने

6:54p.m., 15/8/10 

Tuesday, September 6, 2011

अधूरापन- 2 [तुम्हारे अधूरेपन की सजा ]


तुम जब भी मेरे पास आए
क्यों अपना अधूरापन संग लाये
जो कमी मैंने न महसूस की
वो दंतों से मेरे तन जड़ दी
तुम्हारे स्नेह की कमी अपने दिल में न लाई
पर, गालों पर,
तुम्हारे हाथों ने याद दिलाई
बाबुल का घर छोड़ 'हमारे' घर आई
पर तुमने रखा बना मुझे हरदम पराई
तुम्हारे अपनों को हर कदम अपना माना
पर मुझे कर दिया मेरे ही बाबुल से बेगाना
मेरे सपने तुमसे अथः और इति होते
तुम्हारे बातों, आहों में गैर के चर्चे होते
तुम्हारा अधूरापन मुझे कभी नजर न आया
मेरे हर पग में तुमने केवल अधूरापन पाया
तुम्हारे अधूरेपन की सजा है मैंने यूँ पाई
तुम्हे पूरा न कर सकी स्वयं अधूरी हो आई


6:21p.m., 13/8/10

Saturday, September 3, 2011

अधूरापन- 1



मैं जब आई आत्म लायी
आत्मा से मिलने ही आई
पर जाने क्यों तुम आए
ये तन लेकर ही आए
मैं रही सदा तुम्हे हृदय से लगाये
तुम अपनी कमी से उबर न पाए
जिस मन को तुम्हे समर्पण किया
रौंद उसे जीते जी मृत किया
जिस तन से की तुम्हारी सेवा
दी हस्त, दन्त निशान की मेवा
क्यों अपने को तुमने कमतर माना
जब तुमको था अपना जीवन माना

1:43p.m., 13/8/10

Tuesday, August 9, 2011

तेरी याद


तुमसे बातों में पली
जाने कब रैना ढली
लगे ना अब ये भली
थीं तुम ही मेरी कली

घटाओं से लहराते गेसु
उनमें सजे सुगंधित टेसु
खोया रहता उनकी छाँव में
जब छुपके मिले तेरे गाँव में

वो झींगुर की गुनगुन
तेरी पायल की रुनझुन
रख मेरे होठों पर हाथ-"चुप", कहना
और तेरी चुड़ियों का खनक उठना

मेरा खोना-गीतों सी तेरी बोली
तेरा अल्ह्ड़पन, नयनों से ठिठोली
वो चाँदी बरसाती रातें
होती पूरी बातें

वो बिन कहे कह देना सारा हाल
तेरी हर अदा पर होता निहाल
वो तेरी सखियों की बातें
फुलों, तितलियों से मुलाकातें

वो रूठकर मुँह फेर लेना
मुस्कराकर मेरा गम हर लेना
वो आँखों से रुष्ट होना
वो नयनों से प्रीत बरसाना

पर हरपल तेरी याद जो जगती
पल-पल नागिन सी है डसती
हर क्षण में तेरी याद है बसती
मुस्कान तारों से है बरसती

इन स्याह रातों में
खोया हूँ तेरा यादों में
हरपल स्नेह बरसाती है प्रिये
तेरे शब्दमधु जो मैंने पिए  

Friday, July 22, 2011

मेरे पापा को मुझ पर गर्व है


मितभाषी  हैं  पापा  मेरे
मुस्कान  उनके  चेहरे  पर  खेले
बचपन  में  लड़ती  थी  उनसे
पापा  बात  करो  ना  मुझसे
बस  मुस्कुरा  भर  वो  देते
सर  हाथ  वो  रख  देते
जब  भी  सर  में  दर्द  होता
उनकी  गोद  मेरा  सर  होता 
कभी    जाना  अभाव  क्या  है 
त्याग  कितना  उन्होंने  किया  है 
खरीददारी  थे  वो    करते
बिन  कहे  मगर  भांपा  करते
क्रीम  मेरे  लिए  लाया  करते
सिनेमा  जाने  वो  दिया  करते 
समय  ने  फिर  ली  अंगडाई 
परीक्षा  की  कठिन  घडी  आई 
थी  पर    कभी  अकेले 
पापा  थे  सब  परेशानी  झेले 
बच्चों  की  तकलीफों  ने  होगा  तोडा 
पर  मुस्कान  ने  हमारा  साथ    छोड़ा 
समय  शरीर  पर  घाव  तो  दे  पाया 
पर  मन  को  मेरे  छू    पाया 
माँ-पापा  का  सबल  सहारा 
भाइयों  का  प्रोत्साहन  सारा 
मुस्काते  थे  होंठ  जो  मेरे 
थी  मुस्कान  पापा  की  मेरे
बढ़ती  रही  जीवन  की  राह
बाधाएँ रोक  सकी   प्रवाह
आज  मुझसे  हैं  सब  दम  भरते
पापा  मेरे  चुप  से  हँसते
करते  हैं  प्रशंसा  मेरी  हरपल
पर  मैं   पापा  की  छाया  केवल
भेद-विभेद    कभी  बताया
प्रेम भाव   ही  सदा  सिखाया 
जाना  हिन्दू-मुस्लिम  मैंने  ऐसे 
राम  श्याम  दो  भाई  जैसे 
अपना  मान  रखना   सिखाया 
दूजे  का  सम्मान  समझाया 
कैसे  द्वेष  फिर  मुझमें  भर  जाए 
पापा  ने  जहाँ  स्नेह  पुष्प -खिलाए 
चाहा  पापा  ने  भी  था  दिल  में 
बच्चे  छूएं  बुलंदियाँ  जग  में
सपनों  में  वो  रंग हम  भर  पाए
पापा  हमारे  फिर  भी  हैं  मुस्काए 
जैसा  जीवन  जिया  है  मैंने 
जो  भी  खोया  पाया  जीवन  में
पापा   का  दिया  आत्मबल  है
जिससे  जीवन  जिया  हरपल  है 
बिटिया  से  घर  घर  है 
अपनी  बिटिया  पर  गर्व  है 
यही  मुस्काते  वो  कहते  हैं 
पर  पापा  मेरे  मेरा  गर्व  हैं 
11:56 a.m., 10/8/10

Monday, June 13, 2011

एक कहानी अधूरी


मैं सोच  में  रही  वो  बात  करेंगे
वो  आस  में  रहे  हम  याद  करेंगे
यूँ  सोचते  अर्सा  बीता, गए  तरस
आस  को  आस  लगाये  बीते  बरस

कब  ये  दूरीराहों  मेंपसर  गई
तस्वीरों  में  जम, धूल  की  परत, गई
बस  दो  हाथ  की  ही  तो थी  दूरी 
और  ना  ही  कोई  भी थी  मजबूरी 


समय  बीतता  गया  बढ़ती  गई  दूरियाँ
बढ़ती  गई  जो    थी  कहीं  भी, मजबूरियाँ
  सोच  टूटी    आस  हुई  पूरी
रह  गई  एक  कहानी  फिर  अधूरी
12:51am, 10/10/10