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Friday, February 6, 2009

टूटा तारा

आह माँ तुझसे बिछुडी
हुँ मैं जबसे उखडी
रोपा था मुझे जहाँ
बडी तेज हवाएँ हैं
चिलचिलाती धूप है
पाँव जम नही पा रहे
तेरे आँचल के छाँव की शीतलता
माँ मैं कभी समझी नही
आज याद आती है
नही जानती क्यों अपने से दूर किया
मुझसे क्या त्रुटि हुई माँ
मुझे क्या याद करती हो
क्या बाबा भी कहते हैं मिलने को
क्यों कहते थे मेरी आँख का तारा हो
अब समझ आता है जब देखती हूँ टूटते तारे को
माँ मैंने ऐसा क्या किया
मुझे टूटा तारा बना दिया